यूँ ही नहीं निकला हूँ मैं, इस शहर की गलियों में | सुन ले तू |
वेदना हर अंग की मेरे, रोग बनने ही को हैं | सुन ले तू |
मेरी बेचनीयो का आँचल आज फटने ही को हैं | सुन ले तू |
खाइयाँ अब भर चुकी हैं , पैर से टकराने को | सुन ले तू |
दिल का ये सैलाब अब बेचैन हैं इक आंच बनने को | सुन ले तू |
हजारो जखम खाकर दिल तैयार हैं, अब आग बनने को | सुन ले तू |
तेरी रौशनी की आश में मैं अपनी आँख खो बैठा हूँ |
गर उस मे मुझको चाँद दिखे, तो बेचैन क्यूँ हैं तू |
गर उस में मुझको आश दिखे, तो हैरान क्यूँ ह तू |
बेवफा तुझको हमने इक नहीं दस बार देखा हैं
आसू ही हर बार देता क्यूँ हैं तू |
अच्छा होता की ध्र्रतरास्ट्र होता तू ,
फिर ये दिल न सवाल करता की मेरा निगाहेबान क्यूँ हैं तू |
------ रजनीश
